भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के जीवन के अनसुने किस्से

बिहार राज्य के एक छोटे से गाँव जीरादेयु में 3 दिसम्बर 1884 को जन्मे डॉ राजेन्द्र प्रसाद एक बड़े सयुक्त परिवार में सबसे छोटे सदस्य थे इसलिए वे सबके दुलारे थे . राजेन्द्र प्रसाद को अपनी माता और बड़े भाई महेंदर प्रसाद से बहुत स्नेह था . जिरादेयु गाँव में बहुत से समुदाय रहते थे पर उनका आपस में मेलभाव बहुत था . डॉ राजेद्र प्रसाद अक्सर अपने हिन्दू और मुस्लिम साथियों के साथ बचपन में ” चिक्का और कब्बडी खेला करते थे

 राजेन बाबू ( राजेन्द्र प्रसाद ) को  होली का बेसब्री से इन्तजार रहता था और इस त्यौहार में उनके मुस्लिम दोस्त भी शामिल होते थे और मुहर्रम पर हिन्दू लोग ताजिये निकालते थे . इनको रामायण का पाठ सुनना और स्थानीय रामलीला देखना भी बहुत प्रिय था . इनका पूरा परिवार भगवान में आस्था रखता था और इनकी माता अक्सर रामायण का पाठ सुनाती थी और भजन भी गाती थी .  इनके चरित्र कि दृढ़ता और उदार दृष्टिकोण की आधारशीला बचपन में ही रखी गयी थी .

इनके विवाह की अजब गजब कहानी

इनके गाँव जिरादेयु में पुरारी परम्पराए ही प्रचलित थी , इनके गाँव में भी बाल विवाह आमतौर होता था . राजेद्र प्रसाद का भी 12 वर्ष कि छोटी सी उम्र में विवाह कर दिया गया . इनके विवाह में वधु के घर पहुँचने में घोड़ो , बैलगाडियो और हाथी के जूलूस को दो  दिन लगे थे .

उस समय वर एक चांदी कि पालकी में बैठा करता था और इसको चार लोग उठाते थे . रस्ते में इनको एक नदी भी पार करनी पड़ी . और बारातियों को नदी पार करवाने के लिए नाव का उपयोग किया गया . घोड़े और बेलो ने तो तेरकर नदी पार कर ली पर हाथी ने उतरने से मना कर दिया इस कारण हाथी को पीछे ही छोड़ना पड़ा .इसका राजेन्द्र प्रसाद के पिता ” महादेव सहाय ” को बड़ा दुःख हुआ . इसी समय उन्होंने किसी अन्य विवाह के जूलूस में 2 हाथी देखे उनसे कुछ लेनदेन करके हाथी को फिर से राजेन्द्र के विवाह के जूलूस में शामिल कर लिया गया . किसी तरह यह जूलूस मध्य रात्रि तक वधु के घर पहुंचा . लम्बी यात्रा और गर्मी से लोग बेहाल हो रहे थे परन्तु वर बने राजेन्द्र पालकी में ही सो गये थे .  बड़ी कठिनाई से इनको विवाह कि रस्म के लिए उठाया गया . वधू का नाम राजवंशी देवी था . परम्परा के अनुसार वधु पर्दे में रहती थी . छुटियो में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने और उनसे बात करने का समय बहुत ही कम मिलता था .

राजेद्र प्रसाद बाद में भारतीय राष्ट्रिय आन्दोलन में शामिल हो गये इसलिए इनका पत्नी से मिलना और भी कम हो गया था . आपको जानकर हेरानी होगी कि विवाह के पहले 50 वर्षो में ये लगभग 50 महीने ही साथ रहे थे . राजेद्र प्रसाद का पूरा समय काम में ही निकल जाता था और पत्नी इनके गाँव जिरादेयू में बच्चो और परिवारवालो के साथ रहती थी .

डॉ राजेन्द्र प्रसाद बहुत प्रतिभाशाली और महान विद्वान थे . ये कोलकाता के एक नामी वकील के यहाँ काम सीख रहे थे . इनका जीवन एक सुन्दर सपने जैसा रहा . राजेद्र प्रसाद का पूरा परिवार इनसे कई आशाये लगाये बैठा था . परिवार का इन पर बहुत गर्व था लेकिन राजेन्द्र केवल धन और सुविधाए पाने में विश्वास नहीं रखते थे वे कुछ अलग ही करना चाहते थे .

भारत के लिए महान योगदान

1914 में बिहार और बंगाल आई भयानक बाढ़ उन्होंने काफी बढ़ – चढ़ सेवा कार्य किया था . 1934 में बिहार में भूकम्प के समय ये 2 साल का कारावास काट रहे थे बाहर आने के बाद उन्होंने भूकम्प पीडितो के लिए धन जुटाकर लोगो कि सेवा की . उन्होंने वायसराय से अधिक इस समय धना जुटाया था .

1934 में डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत राष्ट्रिय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये थे . 1939 में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद एक बार फिर से ये कांग्रेस के अध्यक्ष बने . भारत को आजादी मिलने के बाद देश के पहले राष्ट्रपति बने . अपने कार्यकाल के दोरान कभी भी इन्होने कांग्रेस और प्रधानमंत्री कि दखलअंदाजी अपने कार्यो में नहीं होने दी और हमेशा स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहे .

 भारत के सविधान लागू होने से एक दिन पहले यानि 25 जनवरी 1950  इनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया पंरतु ये भारतीय गणराज्य की स्थापना के दाह संस्कार की रस्म में पहुंचे . राजेद्र प्रसाद 12 वर्षो तक राष्ट्रपति पद पर रहने के बाद 1962 में इन्होने अवकाश ले लिया . अवकाश लेने के बाद इनको भारत का सर्वश्रेष्ठ सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया .

अपना आखिरी समय बिताने के लिए इन्होने पटना के पास सदाकत आश्रम चुना और यहीं पर 28 फ़रवरी 1963 को इन्होने अंतिम सांस ली. हमे ऐसे माँ भारती के लाल से सदा शिक्षा मिलती रहेगी और ये हमेशा भारतीयों के दिलो में राज करते रहेंगे .

राजेन्द्र प्रसाद जी कि इस जीवनी को शेयर करना न भूले .

maabharati: