महान युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस की जीवनगाथा

भारत का स्वीधीनता संग्राम का इतिहास महान वीरो और उनके सेंकडो साहसिक कारनामो से भरा पड़ा है . ऐसे बहुत से क्रन्तिकारी हुए है जिन्होंने माँ भारती कि रक्षा के लिए अपने जीवन को बलिदान कर दिया . महान क्रन्तिकारी खुदीराम बोस एक युवा क्रन्तिकारी थे जिनकी शहादत ने पूरे देश में क्रांति कि एक नई लहरी पैदा कर दी . खुदीराम बोस को अंग्रेजो ने केवल 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया था , पर इस वीर अपने अंतिम समय तक गुलामी स्वीकार नहीं की. इस युवा क्रन्तिकारी की वीरता को हमेशा के लिए अमर करने के लिए इन पर गीत लिखे गये और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ . खुदीराम बोस के सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना की गयी जो बंगाल में लोकगीतों के रूप में प्रचलित हुए .

महान युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस की जीवनगाथा

ऐसे हुई खुदीराम के जीवन की शरुआत

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल के मिदनापुर जिले में 3 दिसम्बर 1889 को हुआ था इनके पिता त्रेलोक्यनाथ बोस और माता लक्ष्मीप्रिय देवी थी . खुदीराम बोस के माता-पिता का साया भगवान ने छीन लिया और इनका लालन – पालन इनकी बड़ी बहन ने किया .

इनके मन में देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी की इन्होने अपने स्कूल के दिनों से ही राजनितिक गतिविधिओ में भाग लेना शुरू कर दिया था .  सन 1902 और 1903 के दोरान अरविंदो घोष और भगिनी निवेदिता ने मेदिनीपुर में कई जनसभाए की और क्रांतिकारी समूहों के साथ भी गोपनीय बेठको का आयोजन किया . खुदीराम भी उन युवाओ में शामिल थे जो अंग्रेजो को उखाड़ फेंकने के लिए आजादी के आंदोलनों में शामिल होना चाहते थे . खुदीराम बोस प्राय अंग्रेजो के खिलाफ होने वाले जुलूसो और सम्मेलनों में शामिल होते थे . उनके मन माँ भारती के लिए इंतना प्रेम था कि नोवीं कक्षा में पढाई को छोड़कर माँ भारती की रक्षा के लिए आजादी के आंदोलनों में कूद पड़े .

बंगाल विभाजन का विरोध

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में सत्ता हाथ से जाने के डर के कारण अंग्रेजो ने बंगाल विभाजन की चाल चली जिसका देश में घोर विरोध हुआ .इसी दोरान ही 1905 में खुदीराम बोस आजादी के आंदोलनों में शामिल हुए थे . उन्होंने अपना क्रांतिकारी जीवन सत्येन बोस के नेतृत्व में शुरू किया था . मात्र 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने पुलिस स्टेशनों के पास बम रखा और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाया .

खुदीराम बोस रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बन गये और वन्दे मातरम् के पर्चे वितरित करने में अहम् भूमिका अदा की. 1906 में खुदीराम को पुलिस ने दो बार पकड़ा – 28 फ़रवरी 1906 को सोनार बागला नामक एक इस्तहार बांटते हुए बोस पकडे गये पर पुलिस को चकमा देकर वहां से भाग निकले . इस मामले में उनपर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और उन पर केस चलाया गया पर गवाही के आभाव में बोस निर्दोष छूट गये .

दूसरी बार पुलिस ने उन्हें 16 मई 1906 को गिरफ्तार किया पर नाबालिक होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया .

6 दिसम्बर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ नामक रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गर्वनर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गर्वनर की अच्छी किस्मत ने उनको बचा लिया . वर्ष 1908 में उन्होंने वाट्सन और पेम्फयल्ट फुलर नामक दो अंग्रेज अधिकारियो पर हमला किया लेकिन किस्मत ने इनका भी भरपूर साथ दिया और ये बच निकले .

किग्जफोर्ड को ख़त्म करने की योजना

बंगाल विभाजन से लोगो में रोष था और वे सडको पर विरोध प्रदर्शन करने लगे उनमे से अनेको भारतीय लोगो को कलकता के मजिस्ट्रेट किग्जफोर्ड ने क्रूर दंड दिया . यह लोगो को चुप करने के लिए उनके साथ बहुत क्रूरता करता था . अंग्रेज सरकार ने किग्जफोर्ड के काम से खुश होकर इनकी पदोन्नति कर दी और मुजफ्फरपुर जिले में न्यायधीश के पद पर आसीन कर दिया . भारतीय क्रांतिकारियों ने किग्जफोर्ड को ख़त्म करने का प्लान बनाया और इसके खुदीराम बोस व प्रफुल्ल कुमार को चुना गया . ये मुजफ्फरपुर पहुंचे और किग्जफोर्ड के बंगले और कार्यालय की निगरानी की .

30 अप्रैल 1908 को प्रफुल्ल कुमार और खुदीराम बाहर निकले और किग्जफोर्ड के बगले के बाहर खड़े होकर उसका इन्तजार करने लगे . खुदीराम ने अँधेरे में ही आगे वाली बग्गी पर बम फेंक दिया . किग्जफोर्ड कि किस्मत अच्छी थी कि वह इस बग्गी में नहीं था . इस बम धमाके से अफरा तफरी मच गयी और ये दोनों नन्गे पांव वहाँ से भाग निकले . खुदीराम बोस रेलवे स्टेशन पहुंचे वहाँ एक चाय वाले से पानी माँगा वहां पर स्थित पुलिस वालो ने इनको पहचान लिया और बड़ी मशक्कत के बाद खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया गया .1 मई को उन्हें मुजफ्फरपुर लाया गया .

दूसरी तरफ प्रफुल्ल कुमार चाकी भी भाग भाग कर भूख प्यास से तड़फ रहे थे . 1 मई को त्रिगुनाचरण नाम के ब्रिटिश अधिकारी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बैठाया . ट्रेन यात्रा के दोरान एक ब्रिटिश सब – इंस्पेक्टर को प्रफुल्ल पर शक हुआ इस अधिकारी ने मुजफ्फरपुर पुलिस को इसकी जानकारी दे दी . जब प्रफुल्ल कुमार हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट उतरे तब पुलिस वहां पहले से ही मोजूद थी . अंग्रेजो के हाथो मरने के वजाय प्रफुल्ल कुमार चाकी ने खुद गोली मार दी और माँ भारती के चरणों में अपना जीवन बलिदान कर दिया .

खुदीराम बोस की गिरफ्तारी और फांसी 

खुदीराम बोस को गिरफ्तार करने के बाद इन पर मुकदमा चलाया गया और इनको फांसी की सजा सुनाई गयी . 11 अगस्त 1908 को 19 वर्ष की आयु में इनको फांसी दे दी गयी . खुदीराम बोस इतने निडर थे की गीता हाथ में लिए खुशी – ख़ुशी फांसी पर चढ़ गये .

उनकी निडरता , वीरता और शहादत ने इनको इतना लोकप्रिय कर दिया की बंगाल के जुलाहे एक खाश किस्म की धोती बुनने लगे और बंगाल के राष्ट्रवादियो और क्रांतिकारियों के लिए वे और अनुकरणीय हो गये . इनकी फांसी के बाद विद्यार्थियों और अन्य लोगो ने कई दिनों तक शोक मनाया और इस दोरान स्कूल – कॉलेज बंद रहे . इन दिनों नौजवानों में एक ऐसी धोती का प्रचलन हुआ जिसके किनारों पर खुदीराम बोस लिखा होता था .

माँ भारती के इस वीर पुत्र की जीवनी को अपनों के साथ जरुर शेयर करे . जय हिन्द

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